e-₹UPI क्या है कैसे काम करता है जाने इससे जुड़ी सभी जानकारी

e-₹UPI क्या है कैसे काम करता है जाने इससे जुड़ी सभी जानकारी

e-₹UPI क्या है कैसे काम करता है जाने इससे जुड़ी सभी जानकारी


भारत सरकार द्वारा eRUPI को लॉन्च किया गया है। अगर आप; eRUPI के बारे में विस्तार से जनाना चाहते है तो यह आर्टिकल आपके लिए है। इस आर्टिकल में eRUPI क्या है, इसके फायदे, यह कैसे काम करता है इत्यादि सभी प्रकार के प्रश्नों को कवर किया गया है।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की पहल डिजिटल इंडिया के तहत e-RUPI को लांच किया गया जो की एक  डिजिटल पेमेंट सिस्टम है 


eRUPI एक कैशलेस और कॉन्टैक्टलेस डिजिटल पेमेंट मिडियम है जो लाभकर्ता  के मोबाइल फोन में SMS या QR कोड के तौर पर आएगा।


इसकी शुरुआत  प्रधानमंत्री जी द्वारा 2 अगस्त 2021 को किया गया।


डिज़िटल भुगतान प्रणाली की दिशा में यह  एक अहम क़दम होगा। 


e-RUPI नेशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (NPCI)  के द्वारा विकसित किया गया है।

वित्तीय सेवा विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के साथ मिलकर eRUPI को विकसित किया है।


कैसे काम करता है e-RUPI


यह एक प्रीपेड गिफ्ट-वाउचर की तरह होगा  e-RUPI बेनिफिशिएरी को बिना किसी फिजिकल इंटरफेस के डिजिटली सर्विसेज के स्पॉन्सर्स से कनेक्ट करेगा।


इस प्रणाली में पैसा भेजने वाले और पैसा वसूल करने वाले के बीच, यानी दो पार्टियों के बीच किसी तीसरे का इसमें हस्तक्षेप नहीं होगा।


ये QR कोड या SMS के आधार पर ई-वाउचर के रूप में काम करता है।


एंड्रॉयड फोन में QR कोड एवम फीचर्स फोन में SMS के जरिए कोड भेजा जाएगा।


e-RUPI को NPCI द्वारा उसके UPI प्लेटफॉर्म पर डेवलप किया गया है और इसमें बैंकों को शामिल किया गया है जो इन वाउचर्स को जारी करने का काम करेंगी।


किसी भी कॉर्पोरेट या सरकारी एजेंसी को इसे प्राप्त करने के लिए पार्टनर बैंक्स से कॉन्टैक्ट करना होगा जो प्राइवेट और सरकारी दोनों हो सकते हैं।


इसके साथ इस बात की भी जानकारी देनी होगी कि ये किसके लिए और किस उद्देश्य से लिया जा रहा है। यानी सरकार द्वारा यदि किसी स्कीम के अंतर्गत जैसे किसानों को खाद के लिए QR कोड/SMS दिया गया है तो वह QR कोड सिर्फ और सिर्फ खाद के दुकान पर ही भुना पाएगा।


यदि कोई व्यक्ति चाहे की सरकार द्वारा जारी QR कोड/SMS जिस उदेश्य की लिए दिया गया है वह न कर 

उस QR कोड/SMS को भुना कर कैश करा ले तो वह संभव नही होगा। 


इसमें ई-रुपी वाउचर का इस्तेमाल हुआ या नहीं, ये भी ट्रैक किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति इसका लम्बे समय तक इस्तेमाल नही करता है तो NPCI द्वारा इसे स्वतः निरस्त कर दिया जाएगा।


बेनिफिशिएरी की पहचान उनके मोबाइल नंबर से की जाएगी बैंक द्वारा सर्विस प्रोवाइडर को किसी व्यक्ति के नाम का वाउचर सिर्फ उसी व्यक्ति को दिया जाएगा।


e-RUPI के लाभ


काफी लोगो के मन में यह विचार आ रहा है, कि जब डिजिटल भुगतान प्रणाली जैसे  डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड और यूपीआई जैसे साधन पहले ही मौजूद हैं, तो सरकार  को e-RUPI को लाने की क्या जरूरत थी तो दोस्तो आज हम जानेंगे e-RUPI का लाभ क्या है।


यह  e-RUPI सुनिश्चित करती है कि लाभ बिना किसी परेशानी के लाभार्थीतक पहुंचे।


सरकार  कई योजनाओं के तहत ग़रीबों और किसानों को सहायता के रूप में कैश उनके बैंक खातों में ट्रांसफ़र करती है। इस सिस्टम में सरकारी कर्मचारियों का काफ़ी दखल होता है। कई बार लोगों को इसमें काफ़ी परेशानी भी होती है, आरोप ये भी लगते हैं कि सरकारी कर्मचारी रिश्वत भी लेते हैं।


राजीव  गांधी सरकार में एक बयान में कहा गया कि यदि सरकार गरीबों या किसानों को एक रुपया देती है तो उनके पास मात्र 55 पैसे ही पहुंच पाते है बीच में दलालों या सरकारी कर्मचारियों द्वारा रिश्वत के रूप में खा लिया जाता है।


ई-रुपी के इस्तेमाल से इसका ख़तरा ख़त्म हो जाता।


e-RUPI प्रीपेड होने के कारण बीच में किसी तीसरे व्यक्ति का हस्तक्षेप नहीं रहता है। ऐसी सेवाओं के माध्यम से देश में काफी हद तक भ्रष्टाचार को कम किया जा सकता है।


eRUPI की मदद  से सरकारी संस्थान के अतिरिक्त  यदि कोई निजी संगठन  चाहे तो वह भी इससे भुगतान कर सकते है। जैसे निजी या सरकारी कर्मचारियों के वेतन के अलावा कोई अतिरिक्त राशि जैसे बोनस का भुगतान e-RUPI के मध्यम से किया जा सकता है।


इस ई-रुपी बेनेफिशियरीज़ के विवरण को पूरी तरह गोपनीय रखता है इसलिए इसे आसान और सुरक्षित माना जा रहा है।


इस वाउचर के माध्यम से पूरी लेन-देन प्रक्रिया  तेज़ और साथ ही विश्वसनीय है क्योंकि e-RUPI वाउचर में आवश्यक राशि पहले से ही होती है।


e-RUPI एवम अन्य UPI के बीच अन्तर


अन्य UPI पेमेंट सिस्टम जिससे PAYTM, GOOGLE PAY, PHONE PAY इत्यादि से e-RUPI बिल्कुल अलग है।


इन सभी UPI पेमेंट सिस्टम में रजिस्ट्रेशन की जरूरत पड़ती है जबकि e-RUPI में रजिस्ट्रेशन की कोई जरूरत नही है। यह लाभारती का पहचान उसके मोबाइल नंबर से करता है।


बाकी सभी UPI पेमेंट सिस्टम के लिए एंड्रॉयड फोन की जरूरत है जबकि e-RUPI में किसी भी फोन में काम कर सकता है क्योंकि यह एक QR कोड या SMS ke जरिए भुगतान करता है।


उपरोक्त सभी UPI पेमेंट सिस्टम में इंटरनेट की जरूरत है जबकि e-RUPI में इंटरनेट की कोई जरूरत नहीं है यह बिना इंटरनेट का काम करता है।


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Pegasus क्या है यह कैसे काम करता है जाने इससे जुड़ी सभी जानकारी

Pegasus क्या है यह कैसे काम करता है जाने इससे जुड़ी सभी जानकारी

Pegasus क्या है यह कैसे काम करता है जाने इससे जुड़ी सभी जानकारी


पिछले 3 वर्षो के बाद पेगासस एक बार फिर चर्चा में है।

भारत के संसद में पेगासस को लेकर संसद के बाहर तथा भीतर घमासान लगा रहा।

इस हंगामे को लेकर संसद के मॉनसून सत्र का पहला दिन आखिरकार स्थगित करना पड़ा।

एक रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक वैश्विक सहयोगी जांच प्रोजेक्ट से पता चला है कि इजरायली कंपनी, एनएसओ ग्रुप के पेगासस स्पाइवेयर से भारत में 250 से अधिक मोबाइल नंबरों को टारगेट किया गया, जिसमें वर्तमान सरकार के दो मंत्री, तीन विपक्षी नेता, एक जज, कई पत्रकार और कई व्यवसाई शामिल हैं।

इस संदर्भ आइए हम लोग जानते है कि आखिर में ये पेगासस स्पाइवेयर है क्या तथा ये कैसे काम करता है तथा पहली बार कब पेगासस को लेकर चर्चा हुआ था ।

पेगासस स्पाइवेयर क्या है

पेगासस स्पाइवेयर जो कि डिज़िटल डिवाइस जैसे- कंप्यूटर, मोबाइल, टेबलेट से निजी जानकारियाँ चुराता है। यह जीमेल अकाउंट, बैंक डिटेल्स, सोशल मीडिया, टेक्स्ट मैसेज तथा फोन कॉल इत्यादि जैसी गतिविधियों पर नज़र रखता है तथा वहाँ से डेटा चोरी कर अपने संचालक तक पहुँचाता है।

पेगासस इज़रायली साइबर सुरक्षा कंपनी NSO द्वारा विकसित किया गया एक स्पाइवेयर (जासूसी करने वाला) सॉफ्टवेयर है।

पेगासस स्पाइवेयर उपयोगकर्त्ताओं के मोबाइल और कंप्यूटर से गोपनीय एवं व्यक्तिगत जानकारियाँ चोरी करता है एवं उन्हें नुकसान पहुँचाता है।

पेगासस ऑपरेटर उपयोगकर्त्ताओं के पास एक लिंकभेजता है, जिस पर क्लिक करते ही यह स्पाइवेयर सॉफ्टवेयर उपयोगकर्त्ताओं की के मर्जी के बिना ही फोन में इंस्टाॅल हो जाता है।

अब इसके नए वर्जन में लिंक की भी आवश्यकता नहीं है यह सिर्फ एक मिस्ड काॅल या वीडियो कॉल के द्वारा ही फोन में इंस्टाॅल हो जाता है। पेगासस स्पाइवेयर इंस्टाॅल होने के बाद फोन में उपलब्ध सभी जानकारी अपने ऑपरेटर तक पहुंचता है।

पेगासस स्पाइवेयर की एक प्रमुख विशेषता है कि यह पासवर्ड द्वारा रक्षित उपकरणों को में भी घुस सकता है तथा मोबाइल के रोमिंग में होने पर उसकी डेटा को चुरा नहीं सकता ।


पेगासस स्पाइवेयर, प्रयोगकर्त्ता के मोबाइल फोन या किसी प्रकार के उपकरण की कुल मेमोरी का नामात्र हिस्सा लगभग 5% से भी कम प्रयोग करता है, जिससे उपयोगकर्ता को उसके उपकरण में पेगासस स्पाइवेयर का होने का आभास भी नहीं होता। 

पेगासस स्पाइवेयर, एंड्रॉयड फोन के साथ साथ आईओएस (आईफोन) जैसे उपकरणों को भी हानि पहुंचा सकता है।


एनएसओ समूह (NSO Group) क्या है?


एनएसओ समूह एक साइबर सिक्योरिटी कंपनी है जो ‘निगरानी प्रौद्योगिकी’ में स्पेशलिस्ट है और दुनिया भर में सरकारों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अपराध और आतंकवाद से लड़ने में मदद करने का दावा करती है. एनएसओ समूह 40 देशों में अपने ग्राहकों को 60 खुफिया, सैन्य और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के रूप में बताता है.

हालांकि वह क्लाइंट गोपनीयता का हवाला देते हुए उनमें से किसी की पहचान उजागर नहीं करता है. कैलिफोर्निया में व्हाट्सएप द्वारा पहले के मुकदमे का जवाब देते हुए, एनएसओ ग्रुप ने कहा था कि पेगासस का इस्तेमाल अन्य देशों में सिर्फ संप्रभु सरकारों या उनकी सस्थाओं द्वारा किया जाता है।


पहली बार कब देखा गया पेगासस स्पाइवेयर


पेगासस स्पाइवेयर पर पहली रिपोर्ट तब सामने आई जब संयुक्त अरब अमीरात में एक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता को वर्ष 2016 में जब उनके आईफोन 6 पर एक एसएमएस लिंक के साथ निशाना बनाया गया था।

इसके बाद साल न्यूयॉर्क टाइम्स में वर्ष 2017 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक मेक्सिको की सरकार पर पेगासस की मदद से मोबाइल की जासूसी करने वाला उपकरण बनाने का आरोप लगा ।

WhatsApp के मालिक फेसबुक ने अक्टूबर 2019 में NSO ग्रुप के खिलाफ मुकदमा दाखिल किया था कि इसके पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल कर दुनियाभर में WhatsApp के 1400 यूजर्स को निशाना बनाया गया।

इन आरोपों का जवाब देते हुए NSO ग्रुप ने अपने जवाब में कहा था कि 1400 WhatsApp यूजर को मैसेज करने के लिए पेगेसस इस्तेमाल विदेशी देशों की सरकारों द्वारा किया गया था।

मई 2020 में आई एक रिपोर्ट में एनएसओ ग्रुप पर आरोप लगाया गया कि इसने फ़ेसबुक की तरह दिखने वाली वेबसाइट के माध्यम से यूज़र्स के फ़ोन में हैकिंग सॉफ्टवेयर डालने की कोशिश की थी।

फरवरी 2021 में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय लिया गया कि WhatsApp पेगासस स्पाइवेयर के खिलाफ पूरी तरीके से सुरक्षित नही है अतः इसे पेमेंट की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये।

पेगासस ज़्यादातर लेटेस्ट डिवाइस मॉडल और ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ जुड़ा होता है। इसे इस तरह से डिज़ाइन किया जाता है कि डिवाइस यूज़र को डिवाइस में स्पाइवेयर के होने का पता न चल सके।

कई बार कंपनियाँ अपने कंप्यूटर सिस्टम में खुद स्पाइवेयर डलवाती हैं ताकि ये पता कर सकें कि कर्मचारी अपना काम सही तरीके से कर रहे हैं या नहीं।


पेगासस स्पाइवेयर से बचने की उपाय


स्पाइवेयर की जासूसी से बचने के लिये कंप्यूटर एवं मोबाइल में एंटी स्पाइवेयर सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करने के साथ ही समय-समय पर इसे अपडेट करते रहें।

इंटरनेट पर कोई जानकारी सर्च करते समय केवल विश्वसनीय वेबसाइट पर ही क्लिक करें।

इंटरनेट बैंकिंग या किसी भी ज़रूरी अकाउंट को कार्य पूरा होने के पश्चात् लॉग आउट करें।

पासवर्ड टाइप करने के बाद ‘रिमेंबर’ पासवर्ड या ‘कीप लॉगइन’ जैसे ऑप्शन पर क्लिक न करें।

साइबर कैफे, ऑफिस या सार्वजनिक सिस्टम पर बैंकिंग लेन-देन न करें।

जन्मतिथि या अपने नाम जैसे साधारण पासवर्ड न बनाएँ, पासवर्ड में लेटर, नंबर और स्पेशल कैरेक्टर का मिश्रण रखें। 

सोशल मीडिया, e-Mail, बैंकिंग इत्यादि के पासवर्ड अलग-अलग रखें। बैंक के दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन करें। बैंक की तरफ से आए किसी भी तरह के अलर्ट मेसेज को नज़रअंदाज़ न करें एवं डेबिट कार्ड का पिन नंबर नियमित अंतराल पर बदलते रहें।


पेगासस स्पाइवेयर द्वारा फोन के साथ छेड़छाड़ का पता लगाने का तरीका


क्या हमारा फोन पेगासस से सुरक्षित है की नहीं इसका पता कैसे लगाएं इसके लिए आइए हम जानते है कि क्या कोई ऐसा तरीका है जिसके माध्यम से हम यह पता लगा सके की हमारा फोन सुरक्षित है की नही।

एमनेस्टी इंटरनेशनल के द्वारा एक टूल विकसित किया है जो बता सकता है कि आपका फोन स्पाईवेयर से संक्रमित हुआ है या नहीं। 

इसके लिए आपको एक मैथड मोबाइल वेरिफिकेशन टूल यानी MVT से होकर गुजरना पड़ेगा।

मोबाइल वैरिफिकेशन टूल का यह बताने में मदद करना है कि पेगासस ने डिवाइस को नुकसान पहुंचाया है या नहीं। 

MVT Android और iOS दोनों डिवाइसों पर काम करता है, इसके लिए कमांड लाइन की जानकारी की आवश्यकता होती है। 







 Immune System

Immune System

Immune System


रोग प्रतिरोधक क्षमता ढेर सारी  बीमारी से हमे सुरक्षित रखती है। ऐसे छोटे छोटे कई बीमारियां होती हैं जिनसे हमारा शरीर खुद ही निपट लेता है. 

अपने आसपास आप अकसर देखते होंगे कि कुछ लोग बार-बार बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं, जबकि कुछ पर मौसम की मार या संक्रमण वगैरह का भी ज्यादा असर नहीं होता।

हर जीवित शरीर में प्रकृति ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई हुई है, जो उसे नुकसानदेह जीवाणुओं, विषाणुओं और माइक्रोब्स वगैरह से बचाती है। इसे ही रोगप्रतिरोधक शक्ति या Immunity कहा जाता है।

जिस व्यक्ति की इम्यूनिटी मजबूत है, उसके शरीर में रोगाणु पहुंचकर भी नुकसान नहीं कर पाते, लेकिन जिसकी इम्यूनिटी कमजोर हो गई हो, वह जरा-से मौसमी बदलाव में भी रोगाणुओं के आक्रमण को झेल नहीं पाता है

शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कैसे काम करती है।


जब बैक्टीरिया Bacteria जैसे रोगाणु शरीर में आते हैं, तो वे हमला करते हैं और बढ़ जाते हैं।
बैक्टीरिया या वायरस Virus के इस आक्रमण को एक संक्रमण के रूप में जाना जाता है जो शरीर में बीमारी का कारण बनता है।

हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली संक्रमण से लड़ने के लिए विभिन्न उपकरणों का उपयोग करती है।

रक्त में लाल रक्त कोशिकाएं (RBC) होती हैं जो शरीर के ऊतकों और अंगों के कई हिस्सों में ऑक्सीजन ले जाती हैं, और सफेद रक्त कोशिकाएं (WBC) जिन्हें प्रतिरक्षा कोशिकाएं (Immune Cells) भी कहा जाता है, संक्रमण से लड़ने में मदद करती हैं।

सफेद रक्त कोशिकाओं  निम्नलिखित अवव्य होते हैं

मैक्रोफेज (Macrophages)-

ये कीटाणु, और मरने वाली कोशिकाओं को निगलती हैं और पचाती हैं. ये आक्रमण करने वाले कीटाणुओं  को पीछे छोड़ते हैं जिन्हें एंटीजन के रूप में जाना जाता है. परिणामस्वरूप शरीर एंटीजन को खतरनाक रूप में पहचानता है और उनसे लड़ने के लिए एंटीबॉडी को उत्तेजित करता है।

बी-लिम्फोसाइट्स (B-lymphocytes)-

यह मूल रूप से वे मैक्रोफेज द्वारा पीछे छोड़ दिए गए एंटीजन पर हमला करने के लिए एंटीबॉडी का उत्पादन करते हैं।

टी-लिम्फोसाइट्स (T-lymphocytes)-

यह एक अन्य प्रकार के रक्षात्मक सफेद रक्त कोशिका हैं. इनका काम उन कोशिकाओं पर हमला करना है जो पहले से ही शरीर में संक्रमित हैं।

शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कैसे बढ़ाएं

शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कैसे बढ़ाएं इसे जानने से पहले हमें समझना होगा कि शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता किन कारणों से  कम हो जाती है। 

सफेद रक्त कोशिकाएं खून में हमेशा गश्त करती रहती हैं और ज्यादातर समय बाहरी आक्रमणकारियों की खोज करती रहती है ताकि शरीर की उनसे सुरक्षा की जा सके। 

लेकिन ऐसी कई बीमारियो के कारण सफेद रक्त कोशिकाओं की कार्यपद्धति प्रभावित होती है।

इसके अलावा कुछ दवाइयां भी हैं जो आपके रोगों से लड़ने की क्षमता और प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करती हैं।

इतना ही नहीं आपकी बढ़ती उम्र भी इम्यून सिस्टम को कमजोर बनाती है

जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है उन्हें अपनी लाइफस्टाइल में कुछ बदलाव करने के साथ ही कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसे-

1. कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोग हमेशा स्वस्थ रहें इसके लिए बेहद जरूरी है कि वे साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें

2. अगर किसी व्यक्ति का इम्यून सिस्टम कमजोर है तो उन्हें किसी भी तरह के इंफेक्शन से पीड़ित या बीमार व्यक्ति के बेहद नजदीक जाने से बचना चाहिए।

3. तनाव के कारण भी व्यक्ति के इम्यून सिस्टम को कमजोर बना देता है, लिहाजा अपने तनाव को मैनेज करना और कंट्रोल करना भी बेहद जरूरी है। तनाव को कंट्रोल करने के लिए योग करें, मेडिटेशन करें, मसाज करवाएं, अपनी पसंदीदा हॉबीज को समय दें

4. नींद की कमी की वजह से इम्यून सिस्टम का सबसे अहम हिस्सा- सफेद रक्त कोशिकाओं के सामान्य उत्पादन में कमी आती है। सीडीसी की मानें तो वयस्कों के लिए रोजाना रात में कम से कम 7 घंटे की नींद बेहद जरूरी है। वहीं बच्चों के लिए उनकी उम्र के हिसाब से 8 से 17 घंटे की नींद जरूरी है।

5. जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर हो उन्हें अपनी डायट में फल और सब्जियों को अधिक मात्रा में शामिल करना चाहिए ताकि उन्हें भरपूर मात्रा में पोषक तत्व प्राप्त हो सकें। इसके अलावा कच्चे या कम पके हुए मांस, मछली और अंडे का सेवन न करें, पास्चरीकृत डेयरी प्रॉडक्ट्स का ही सेवन करें, फल और सब्जियों को खाने से पहले उन्हें अच्छी तरह से धोकर साफ कर लें।

6.  रोज एक्सरसाइज करने से भी आपका शरीर स्वस्थ रहता है। एक्सरसाइज करने के दौरान एन्डॉर्फिन हार्मोन रिलीज होता है जिससे स्ट्रेस लेवल में कमी आती है। 

Immune system को बढ़ाने के लिए आप विटामिन-A , विटामिन-D, विटामिन-C, विटामिन-E, आयरन, फॉलिक एसिड, जिंक युक्त भोजन में या सप्लीमेंट का प्रयोग करें।










Coronavirus कोरोनावायरस

Coronavirus कोरोनावायरस

Coronavirus कोरोनावायरस


(Coronavirus) अनेकों प्रकार के वायरसो का एक समूह है जो कई सारे स्तनधारियों और पक्षियों में रोग उत्पन्न कर सकता है। कोरोनावायरस एक प्रकार का Ribose Nucleic Acid (RNA) वायरस हैं। इनके कारण मनुष्य में श्वास तंत्र संक्रमण पैदा हो सकता है जिसकी गहनता हल्की से लेकर अति गम्भीर हो सकती है।  इनकी रोकथाम के लिए अब टीका (वैक्सीन) अब उपलब्ध है और उपचार के लिए प्राणी की अपने प्रतिरक्षा प्रणाली पर निर्भर करता है। 


उत्पति स्थान क्या है? कैसे पड़ा कोरोनावायरस नाम

इस बीमारी को पहली बार वुहान,चीन में पाया गया था, इसलिये इसे कभी-कभी "वुहान वायरस" या "वुहान कोरोनावायरस" कहा जाता है। मगर जगहों के नामों के आधार पर प्रयोग करने पर मनाही के कारण इसका नाम इसका नाम बुहान वायरस नहीं रखा गया। कोरोना वायरस के लक्षण एक हल्का ज़ुखाम से लेकर ज़्यादा गंभीर रोगों कि वजह हो सकती है जैसे कि मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (Middle East Respiratory Syndrome: MERS-CoV) और सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (Severe Acute Respiratory Syndrome: SARS-CoV) | यह वायरस से इंसान और जानवर दोनों संक्रमित हो सकते है  इस वायरस को अभी “SARS-CoV-2” का नाम रखा गया है और इसकि वजह से आने वाली बीमारी को “Corona Disease 2019” यानी “COVID-19” है |

लैटिन में "कोरोना" का अर्थ "मुकुट" होता है और इस वायरस के कणों के इर्द-गिर्द उभरे हुए कांटे जैसे ढाँचों से इलेक्ट्रान सूक्षमदर्शी में मुकुट जैसा आकार दिखता है, जिस पर इसका नाम रखा गया था। सूर्य ग्रहण के समय चंद्रमा सूर्य को ढक लेता है तो चन्द्रमा के चारों ओर किरण निकलती प्रतीत होती है उसको भी कोरोना कहते हैं। 

कैसे दिखता है कोरोनावायरस?

बड़े गोलाकार कणों के रूप में होते हैं।  वायरस के कणों का व्यास लगभग 120 नैनोमीटर होता है। जहां मेम्ब्रेन(झिल्ली), आकार का प्रोटीन डले होते हैं। कोरोना वायरस का एक उपसमूह (विशेष रूप से betacoronavirus उपसमूह A के सदस्य) हेमग्लगुटिनिन एस्टरेज़ नामक एक छोटा स्पाइक जैसी सतह भी प्रोटीन है। कैप्सूल के अंदर न्यूक्लियोकैप्सिड होते है, जो कि न्यूक्लियोकैप्सिड (एन) प्रोटीन की कई प्रतियों से बनता है। ये RNA युक्त विषाणु होते हैं।  जब यह होस्ट सेल के बाहर होता है तो लिपिड बाईलेयर कैप्सूल, झिल्ली प्रोटीन और न्यूक्लियोकैप्सिड वायरस की रक्षा करते हैं।


कोरोनावायरस का वंश


1.अल्फ़ाकोरोनावायरस 
2.बेटाकोरोनावायर
3.गामाकोरोनावायर
4.डेल्टाकोरोनावायर

अल्फ़ाकोरोनावायरस (Alphacoronavirus) वायरस के कोरोनाविरिडाए कुल के चार सदस्य जीववैज्ञानिक वंशों में से एक है। अल्फ़ाकोरोनावायरस और बेटाकोरोनावायरस मूल रूप से चमगादड़ में संक्रमण करने वाले वायरस के वंशज हैं जो मानवों व अन्य स्तनधारियों में भी फैल जाते हैं। 

कोरोनाविरिडाए (Coronaviridae)

वायरस का एक जीववैज्ञानिक कुल है। इसकी सदस्य जातियों को इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से देखने पर सूर्यग्रहण में दिखने वाली कोरोना जैसे उभराव दिखते हैं, जिस से इसका यह नाम पड़ा। यह आरएनए वायरस होते हैं जिनमें आरएनए के एक-रेशा और उसे ढेपता हुआ प्रोटीन का एक खोल होता है। कोरोनावायरस इसी कुल का सदस्य हैं। 


इस वायरस के मानव में।  इसका प्रसार मुख्य रूप से लगभग 6 फीट (1.8 मीटर) की सीमा के भीतर खांसी और छींक से होता है। दूषित जगह के माध्यम से अप्रत्यक्ष संपर्क, संक्रमण का एक और संभावित कारण है।

लक्षण

बुखार 87.9   सूखी खांसी 67.7  थकान 38.1 लार का निर्माण 33.4 गंध ना आना and स्वाद ना आना 30 से 66 सांस लेने में तकलीफ 18.6 मांसपेशियों या जोड़ों में दर्द 14.8 गले में खरास 13.9 सर दर्द 13.6
ठंड लगना 11.4 उलटी अथवा मितली 5.0 नाक बंद 4.8 दस्त 3.7 से 31 हेमोटाईसिस 0.9 कंजेक्टिवल रक्त-संकुलन 0.8 इत्यादि।

 

कोरोनावायरस वैरिएंट 

दुनियाभर में जिस कोरोना वायरस ने इस वक्त तबाही मचा रखी है, लेकिन ये वो कोरानावायरस नहीं है जो पहली बार चीन से निकला था. बल्कि वह म्यूटेट हो रहा है।
म्यूटेट होने का मतलब है वायरस के जेनेटिक मटेरियल में बदलाव होना. वैज्ञानिकों ने इस वायरस में हज़ारों म्यूटेशन देखे हैं.

पहला म्यूटेटिड वायरस, B.1.1.7 था जो इंग्लैंड में पाया गया था इसे U K वेरिएंट भी कहते है। ये वेरिएंट पुराने वेरिएंट्स की तुलना में 40-70% अधिक संक्रामक  था। दूसरा वेरिएंट ब्राजील में E484K का पता चला। ये पिछले की तुलना में और अधिक खतरनाक पाया गया।  E484K से ताल्लुक रखने वाला ये म्यूटेशन एंटीबॉडीज को चकमा देने में माहिर पाया गया। इसके अतिरिक्त, N501 म्यूटेशन इसे और घातक बनाता है। इंडिया में उत्तपन कोरोना का डबल म्यूटेंट वेरिएंट, जिसे वैज्ञानिकों ने B.1.617 का नाम दिया है। कोरोना की दूसरी लहर के बीच इससे संक्रमित भी काफी मरीज पाए जा रहे हैं। कोरोना के सेकंड वेरिएंट में मौजूद E484Q और L452R म्यूटेशन्स, इसे ज्यादा संक्रामक और एंटीबॉडीज को पार कर शरीर में प्रवेश करने में सक्षम बनाते हैं। भारत के एक राज्य पश्चिम बंगाल में SARS-COV-2 के एक और नए वेरिएंट का पता लगाया गया है। वैज्ञानिक ने इसे B.1.618 नाम दिया है। ट्रिपल म्यूटेशन कोरोनावायरस वेरिएंट, जो कोविड के तीन अलग-अलग स्ट्रेन का एक समूह  है।दूसरे शब्दों में ट्रिपल म्यूटेशन का मतलब है कि कोरोना वायरस के तीन अलग-अलग स्ट्रेन यानी स्वरूप मिलकर एक नए वेरिएंट में बदल गए हैं।


तीन स्ट्रेन मिलकर बने इस नए टाइप में E484K जैसे अलग जेनेटिक वेरिएंट्स पाए गए हैं, ये थर्ड वेरिएंट उन लोगों के शरीर में भी एंटीबॉडीज को पार कर प्रवेश कर संक्रमित कर सकता है, जो पहले कोविड-19 से ठीक हो चुके हैं।







What is Vaccine in hindi

What is Vaccine in hindi

What is Vaccine in hindi


जीवों के शरीर का प्रयोग करके बनाया गया द्रव्य है जो किसी व्यक्ति के शरीर में किसी रोग या बीमारी से लड़ने की क्षमता बढ़ा देता है यानी किसी व्यक्ति के Immune System को  बढ़ा देता है। वैक्सीन दो प्रकार का होता है 

जीवाणुजन्य वैक्सीन (Bacteria Causes Vaccine)

जैसे-विपूचिका का वैक्सीन, टाइफाइड का वैक्सीन, प्लेग का वैक्सीन, क्षयरोधी वैक्सीन, टाइफस का वैक्सीन, कुक्कुरखाँसी का वैक्सीन, डिप्थीरिया का वैक्सीन, टेटनस का वैक्सीन, 

विषाणुजन्य  वैक्सीन (Virus Causes Vaccine)

जैसे- Rabies का वैक्सीन, इंफ्लुएंजा का वैक्सीन, पोलियो का वैक्सीन, पीतज्वर का वैक्सीन, चेचक का वैक्सीन, कोरोनावायरस का वैक्सीन  Coronavirus vaccine

पहली Vaccine कब बनी थी?

दुनिया में  पहली बार चेचक नामक बिमारी के टीके की खोज 1796 में अंग्रेज चिकित्सक एडवर्ड जेनर ने किया था। 

बाद प्रसिद्ध फ्रेंच वैज्ञानिक लुई पाश्चर ने रेबीज के टीके का सफल परीक्षण किया. 

Vaccine कैसे बनती है? 

जब कोई रोगजनक वायरस या बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश करता है तब उसका मुकाबला हमारे रक्त में मौजूद व्हाइट ब्लड सेल्स (WBC) से होता है

WBC में उपस्थित टी-लिम्फोसाइट्स और बी-लिम्फोसाइट्स एंटीबाडीज उत्पन कर उस बैक्टीरिया या वायरस को नष्ट कर देता है।

एक बार जब संक्रमण खत्म हो जाता है, तो शरीर "मेमोरी" आपूर्ति को याद रखता है और परिणामस्वरूप टी-लिम्फोसाइट्स और बी-लिम्फोसाइट्स याद रखते हैं कि भविष्य में बीमारी से कैसे लड़ना है।

ठीक इसी तरह वैक्सीन या टीका बनाने के लिए वायरस या वैक्टीरिया को किसी केमिकल से पहले कमजोर कर देते हैं जिससे उसकी बीमारी फैलाने की क्षमता कम हो जाती है फिर कमजोर करने के बाद उसको  किसी जीव के शरीर में इंजेक्ट कर देते हैं ।

फिर प्रतिरक्षा प्रणाली उसी तरह से प्रतिक्रिया करती है जिस तरह से यह एंटीबॉडीज पैदा करके बीमारी पर आक्रमण करेगी। 
अब एंटीबॉडी टीके के कीटाणुओं को नष्ट कर देते हैं, जैसा कि वे एक प्रशिक्षण अभ्यास की तरह रोग के कीटाणुओं के साथ करते हैं
फिर वे शरीर में रहते हैं और इम्युनिटी प्रदान करते हैं
यदि कोई व्यक्ति कभी भी वास्तविक बीमारी के संपर्क में आता है, तो उसकी रक्षा के लिए एंटीबॉडी होते हैं।

कैसे काम करती है Vaccine?

टीके या वैक्सीन शरीर मे प्रतिरक्षा प्रणाली या इम्यून सिस्टम को विकसित करने में मदद करते हैं जो कि संक्रमण से लड़ते हैं।

इस प्रकार के संक्रमण के कारण कभी भी फिर से बीमारी नहीं होती है, लेकिन यह प्रतिरक्षा प्रणाली को टी-लिम्फोसाइट्स और एंटीबॉडी का उत्पादन करने का कारण बनता है।

कभी-कभी टीका लगने के बाद बुखार या शरीर में दर्द जैसे लक्षण हो सकते हैं 
इस तरह के लक्षण सामान्य हैं क्योंकि शरीर प्रतिरक्षा प्रणाली या इम्यूनिटी बनाता है।

लेकिन बी-लिम्फोसाइट्स का उत्पादन करने में शरीर को कुछ सप्ताह लगते हैं इसलिए, यह संभव है कि एक व्यक्ति टीकाकरण से ठीक पहले या उसके ठीक बाद किसी बीमारी से संक्रमित हो जाए, तो उसमें लक्षण विकसित हो सकते हैं और बीमारी हो सकती है क्योंकि वैक्सीन को सुरक्षा प्रदान करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलेगा.